Sudha Chandran biography in Hindi | सुधा चंद्रन के जीवनी के बारे में हिंदी में

Sudha Chandran biography


दोस्तो आज की हमारी कहानी एक बहुत ही खास है जिसे कि शायद आप सभी जानते होंगे लेकिन उनकी कहानी बहुत ही कम लोग जानते हैं। यह कहानी एक डांसर की है जिन्होंने अपना एक पैर खो दिया लेकिन डांस ने एक बार फिर उन्हें एक नई जिंदगी दी। वे जिंदगी में कभी हार न मानने वाला जिसपर लेकर आगे बढ़ती रही और सबके लिए एक मिसाल बन गई। तो चलिए आज की कहानी की शुरुआत करें जिसकी नायिका हैं सुधा चंद्रन सुधा जी का जन्म एक तेलुगु परिवार में हुआ और वह अपने माता पिता की अकेली संतान थीं। 


उन्हें डांसिंग का बड़ा शौक था इसलिए उनके पिता ने उन्हें डांसिंग इंस्टिट्यूट में दाखिला दिलवाया और उन्होंने तीन साल की छोटी सी उम्र से डांस सीखना शुरू किया। उनकी पहली स्टेज परफॉर्मेंस थी 


जब वह केवल 8 साल की थीं। उन्होंने डांसिंग के साथ साथ अपनी पढ़ाई को भी जारी रखा और जब वे 16 साल की हुई तब वह लगभग 75 स्टेज परफॉर्मेंस दे चुकी थी। वह न केवल डांस में बल्कि अपनी पढ़ाई में भी बहुत होशियार थी। 


उन्हें टेंथ स्टैंडर्ड में 80% मार्क्स मिले थे। हर कोई चाहता था कि वह साइंस स्ट्रीम से पढ़ाई करें लेकिन उन्होंने आर्ट्स स्ट्रीम चुनी ताकि वे अपनी पढ़ाई के साथ साथ डांस को भी जारी रख सकें। लेकिन उनके जन्मदिन से सिर्फ चार दिन पहले सुधा का एक एक्सीडेंट हुआ 


जिसने उनकी ज़िन्दगी को पूरी तरह बदल दिया। बात है मई 1981 की जब वह बस से तिरुचि जा रही थीं तब उनका एक बड़ा एक्सीडेंट हो गया जिसके कारण उनके पैर में फ्रैक्चर हुआ और कुछ छोटी मोटी चोटें लगीं। पर बस में और जितने भी लोग थे उनमें से सुधा सबसे कम घायल हुई 

लेकिन हॉस्पिटल में मरीजों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि सुधा का इलाज कुछ इन इंटेरेस ने किया जो उनके दाएं पैर की टखने में लगी चोट को मरहम लगाना भूल गए और उसे यूं ही बांध दिया जिसके कारण उनके पैर में गैंगरीन हो गया और यह गैंगरीन उनके पूरे शरीर में फैल सकता था। 


गैंगरीन को फैलने से रोकने के लिए उनके माता पिता ने फैसला किया कि उनका दायां पैर कटवाना होगा और इस तरह उनका दायां पैर और घुटने से नीचे से सेवन पॉइंट फाइव इंच तक हिस्सा काटा गया ताकि यह इन्फेक्शन न फैले। इन्फेक्शन तो फैलने से रुक गया लेकिन अब सुधा बुरी तरह से टूट गई थीं 


क्योंकि पैर खोने के बाद उन्हें अहसास हुआ कि डांस न सिर्फ उनका पैशन है बल्कि उनका प्यार भी है और एक पैर के साथ कोई कैसे नाच सकता है और इस कारण वह धीरे धीरे डिप्रेशन में रहने लगी। लेकिन सुधा हार मानने वालों में से नहीं थीं। डांस के लिए उनका प्यार इतना था कि उन्होंने एक बार फिर अपने पैरों पर चलना सीखा। 

अपने आर्टिफिशियल पैर के साथ चलना सीखने में उन्हें 4 महीने का समय लगा। जब उन्होंने चलना सीखा उसके बाद वह डांस स्टेप करने लगीं। यह आसान तो नहीं था पर बहुत ही दर्द और तकलीफ देता था। कई बार तो ऐसा होता कि उनके पैरों से खून निकलने लगता पर वह रुकती नहीं और आगे बढ़ती जाती। 


सुधा लोगों की दया या उनका तरस नहीं चाहती थीं। वह उन सबको दिखाना चाहती थीं कि वह अपने आर्टिफिशल पैर के साथ भी डांस कर सकती हैं। उनकी मेहनत और परिवार के सपोर्ट ने उन्हें डांस करने का कॉन्फिडेंस दिया और अब वह पूरी दुनिया के सामने अपना पैशन दिखाने के लिए तैयार थीं। 28 जनवरी 1984 मुम्बई के सेंट जेवियर कॉलेज में उनका स्टेज परफॉर्मेंस था। 

उनके शो की सारी टिकट्स जल्दी बिके क्योंकि हर कोई देखना चाहता था कि कैसे एक लड़की एक पैर के साथ डांस कर सकती है और ऑडियंस में सिर्फ आम लोग ही नहीं बल्कि मीडिया और कई फिल्मी सितारे भी थे। 

वह शो देखने के लिए हैदराबाद के रामोजी राव फिल्म इंडस्ट्री के मालिक रामोजी राव भी मौजूद थे। सुधा जानती थी की ऑडियंस उसी सुधा को देखना चाहती है जिसे वे आज तक देखती आई है। यह वह पल था जब उन्हें अहसास हुआ कि यह उनका सपना पूरा करने का सबसे बड़ा मौका है 

और अपने सपने को साकार करने के लिए उन्होंने जो भी मेहनत की थी खून पसीना बहाया था। उस मेहनत और लगन ने जैसे उनके आर्टिफिशल पैर में भी जान डाल दी और उनकी परफॉमेंस के अंत में लोगों ने उनके लिए खड़े होकर तालियां बजाईं। 

उस पल से उनकी जिंदगी बदल गई क्योंकि उस परफॉर्मेंस के बाद उन्हें न सिर्फ भारतीय बल्कि इंटरनेशनल मीडिया ने भी काफी सराहा। उन्हें कई देशों में परफार्मेंस करने के लिए इन्विटेशन आए और रामोजी राव ने उनकी जीवनी की कहानी पर तेलुगू भाषा में एक फिल्म बनाई जिसमें लीड रोल सुधा ने ही किया था। यह मूवी 1985 में मयूरी के नाम से बॉक्स ऑफिस पर आई और इसने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए 

और बेस्ट फीचर फिल्म अवार्ड जीता। इस फिल्म को मलयालम और तमिल भाषा में भी डब किया गया और नाचे मयूरी नाम से हिंदी भाषा में भी दोबारा बनाया गया। सुधा हिंदी तमिल मलयालम तेलगू गुजराती कन्नड़ भाषा की कई फिल्मों में काम कर चुकी हैं  

उन्होंने कई टीवी सीरियल्स में भी काम किया है और कुछ डांस रियलिटी शो में बतौर जज रह चुकी हैं। सुधा कहती हैं कि ऐक्सिडेंट के बाद उन्होंने सोचा था कि शायद उनकी जिंदगी बर्बाद हो गई पर जब उन्होंने यह सब पाया तूने अहसास हुआ कि उस दुर्घटना में भी कहीं न कहीं ईश्वर का आशीर्वाद उनके साथ था। 

सुधा चंद्रन ने यह साबित कर दिया कि आपने भले ही अपने शरीर का कोई महत्वपूर्ण अंग खो दिया हो लेकिन वह भी आपको आपके सपने तक पहुंचने से नहीं रोक सकता। 

इसलिए हालातों से हारने की बजाए उनसे लड़ें क्योंकि ऐसा करने से आप अपने अंदर की शक्ति को पा सकेंगे और अपना सपना पूरा कर सकेंगे। उम्मीद है कि आपको आज की यह कहानी पसंद आई होगी  है  


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